आखिर 50 मिलियन साल राज करने वाला यह 26 फुट ऊंचा दैत्य मरा कैसे?

आज से लगभग 360 मिलियन वर्ष पहले, धरती पर 50 मिलियन सालों तक एकछत्र राज करने वाले 26 फुट ऊंचे 'प्रोटोटैक्साइट्स' (Prototaxites) का अचानक वजूद मिट गया। जीवाश्म विज्ञानियों ने इस प्राचीन 'मर्डर मिस्ट्री' को सुलझा लिया है, जिसके अनुसार इस विशालकाय जीव की मौत किसी क्षुद्रग्रह के टकराने से नहीं हुई थी।


इस गगनचुंबी दैत्य को मौत के घाट उतारने वाले असल कातिल धरती पर पनप रहे पहले असली 'संवहनी पौधे' (Vascular plants) थे।

प्रतिष्ठित पत्रिका 'साइंस एडवांसेज' में प्रकाशित डॉ. कोरेंटिन लोरोन के नवीनतम शोध से साबित होता है कि यह जीव एक 'इवोल्यूशनरी डेड-एंड' था। यह न पौधा था और न ही फंगस, बल्कि जीवन की एक ऐसी स्वतंत्र वंशावली था जो नए जंगलों के उदय के कारण भूखा मर गया।

'आर्कियोप्टेरिस' का जानलेवा उदय और संसाधनों का युद्ध

डेवोनियन (Devonian) काल के अंत तक पृथ्वी का सपाट और बंजर परिदृश्य पूरी तरह से बदलने लगा था। पेलियोबॉटनिस्ट्स के अनुसार, 'आर्कियोप्टेरिस' (Archaeopteris) जैसे पहले वास्तविक पेड़ों ने अपनी गहरी जड़ों के साथ ज़मीन पर आक्रामक रूप से कब्ज़ा करना शुरू कर दिया था।

लगभग 30 मीटर तक ऊंचे होने वाले इन नए पेड़ों ने आसमान की ओर उठकर सूर्य का प्रकाश पूरी तरह रोक दिया। इसके साथ ही इनकी गहरी जड़ों ने मिट्टी के रसायन और फॉस्फोरस चक्र को जड़ से बदल डाला।

प्रोटोटैक्साइट्स एक 'हेटेरोट्रोफ़' (Heterotroph) था, जो सड़े-गले पदार्थों से बहुत धीमी गति से अपना पोषण प्राप्त करता था। नए जंगलों के उदय से इस जीव की खाद्य आपूर्ति कट गई और संसाधनों की इस खौफनाक कमी ने इसे मौत के कगार पर ला खड़ा किया।

जब समंदर और ज़मीन के राजाओं ने घुटने टेके

विकासवाद का नियम बेहद क्रूर है; जो जीव खुद को बदल नहीं पाता, प्रकृति उसे हमेशा के लिए मिटा देती है।

इसे हम धरती के प्रोटोटैक्साइट्स और समंदर के खूंखार राजा 'बेसिलोसॉरस' (Basilosaurus) की तुलना से अच्छी तरह समझ सकते हैं। बेसिलोसॉरस 60 फुट लंबा था और उसकी बाइट फोर्स 20,000 न्यूटन थी, जो आज के मगरमच्छों के बराबर है, फिर भी वह विलुप्त हो गया।

जिस तरह समुद्री धाराएं बदलने और शिकार की कमी से वह समुद्री दैत्य मारा गया, ठीक वैसे ही 26 फुट का प्रोटोटैक्साइट्स नए पेड़ों से 'संसाधनों का युद्ध' हारकर एक 'इवोल्यूशनरी डेड-एंड' बन गया।

30°C से 17°C का सफर और वायुमंडल का भयानक बदलाव

इन पहले जंगलों ने केवल ज़मीन ही नहीं छीनी, बल्कि पृथ्वी के पूरे वायुमंडल को भी हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। इन विशाल पेड़ों के फैलाव ने हवा से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखना शुरू कर दिया।

इस भारी कार्बन अवशोषण के कारण पृथ्वी का औसत तापमान 30°C से तेज़ी से गिरकर 17°C पर आ गया।

यह भयानक और अचानक हुआ जलवायु परिवर्तन (Climate cooling) उस 26 फुट ऊंचे प्राचीन जीव के लिए एक और बड़ा जानलेवा झटका साबित हुआ। वह इस नए और ठंडे पारिस्थितिकी तंत्र के अनुकूल खुद को ढाल नहीं सका।

कीड़ों का अंतिम प्रहार और विकासवाद का सबसे बड़ा सबक

बचे-खुचे और कमज़ोर हो चुके इन दैत्यों पर ज़मीन के शुरुआती आर्थ्रोपोड्स (Arthropods) यानी मिलीपीड्स और प्राचीन कीड़ों ने सीधा हमला कर दिया।

कनाडा और स्कॉटलैंड से मिले जीवाश्मों में स्पष्ट छेद (Boreholes) मिले हैं, जो यह साबित करते हैं कि इन कीड़ों ने उस लाचार जीव को अपना भोजन बना लिया था। लगभग 360 मिलियन वर्ष पहले, ये गगनचुंबी खंभे हमेशा के लिए धूल में मिल गए।

इनकी मौत ने चार पैरों वाले जीवों और आधुनिक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक नया और सुरक्षित रास्ता खोल दिया। यह ऐतिहासिक घटना हमें सिखाती है कि चाहे आपकी बाइट फोर्स 20,000 न्यूटन हो या ऊंचाई 26 फुट, बदलती जलवायु के आगे कोई नहीं टिक सकता।

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