यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो (University of Toronto) की प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर बारबरा शेरवुड लोलर (Barbara Sherwood Lollar) के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने यहां पृथ्वी के सबसे पुराने जल-स्रोत की खोज की है।
'एबिटिबी ग्रीनस्टोन बेल्ट' (Abitibi Greenstone Belt) की प्राचीन चट्टानों के बीच, सतह से 3.1 किलोमीटर नीचे बहने वाले इस पानी की उम्र 2 अरब साल आंकी गई है।
24 किलोमीटर का घुमावदार रैंप और 'मस्टी' गंध: खदान का जमीनी सच
यह कोई साधारण वातानुकूलित प्रयोगशाला नहीं है, बल्कि यहां तक पहुंचने का सफर मानवीय सहनशक्ति की चरम परीक्षा है।
वैज्ञानिकों को पहले एक दो-मंजिला पिंजरेनुमा लिफ्ट में बैठकर नीचे उतरना पड़ता है, और फिर 24 किलोमीटर लंबे अंधेरे और घुमावदार रैंप से होकर गुजरना होता है।
प्रोफेसर लोलर के अनुसार, वे चट्टान की दरारों को अपनी आंखों से पहले अपनी नाक से पहचानती थीं।
वहां सल्फेट की एक अजीब 'मस्टी' (Musty) और बासी गंध हवा में तैरती रहती है, जो सीधे इस प्राचीन पानी के स्रोत तक ले जाती है।
अक्सर लोग सोचते हैं कि करोड़ों साल पुराना यह पानी चट्टानों से केवल बूंद-बूंद टपकता होगा, लेकिन असल में यह 2 लीटर प्रति मिनट की उच्च दर से बुलबुले छोड़ते हुए बाहर बह रहा है।
वैज्ञानिकों ने इसे पीने से क्यों किया इनकार?
इस ऐतिहासिक खोज के बाद इंटरनेट पर यह सवाल तेजी से फैला कि क्या भूवैज्ञानिकों ने पृथ्वी के इस सबसे पुराने पानी को गिलास में भरकर पिया था।
प्रोफेसर लोलर ने स्पष्ट किया कि उन्होंने ऐसा कोई जोखिम नहीं लिया, बल्कि केवल अपनी उंगली से इसकी एक बूंद को चख कर (Taste) देखा था।
प्रयोगशाला के आंकड़ों के अनुसार, यह पानी हमारे आधुनिक समुद्री जल की तुलना में 10 गुना अधिक खारा है, जिसे वैज्ञानिक तकनीकी भाषा में 'हाइपरसेलाइन ब्राइन' (Hypersaline Brine) कहते हैं।
इसका स्वाद बेहद कड़वा और नमकीन है, और इसकी बनावट मेपल सिरप की तरह गाढ़ी और विस्कोस (Viscous) है, जो इसे इंसानी खपत के लिए पूरी तरह से अयोग्य और जहरीला बनाती है।
86Kr आइसोटोप और डेटिंग की 'पैसेंजर ट्रेन' थ्योरी
इस पानी की सटीक उम्र जानने के लिए शोधकर्ताओं ने पारंपरिक कार्बन डेटिंग का उपयोग नहीं किया, क्योंकि वह इतनी पुरानी समय-सीमा के लिए काम नहीं करती।
इसके बजाय, उन्होंने 'नोबल गैस आइसोटोप्स' (Noble Gas Isotopes) का सहारा लिया, जिसमें 86Kr (Krypton) ट्रेसर डेटिंग (86Kr Krypton Tracer Dating) ने एक क्रांतिकारी भूमिका निभाई।
प्रोफेसर लोलर इस जटिल डेटिंग प्रक्रिया को एक 'ट्रेन मेटाफर' (Train Metaphor) के जरिए बेहद सरलता से समझाती हैं।
वे कहती हैं कि यह प्राचीन पानी एक चलती हुई ट्रेन की तरह है, और हीलियम, नियॉन या आर्गन जैसे गैस के आइसोटोप्स उसमें चढ़ने वाले यात्री हैं।
पानी जितने अधिक समय तक सतह से कटकर चट्टानों के बीच फंसा रहेगा, उसमें उतने ही अधिक 'यात्री' जमा होंगे; इसी भारी संचय ने 2 अरब साल की उम्र पर अंतिम वैज्ञानिक मुहर लगाई है।
अंधेरे में पनपता एक स्वदेशी साम्राज्य
इस जल भंडार का सबसे हैरान करने वाला पहलू दिसंबर 2024 में सामने आया, जब इसमें 'कैंडिडेटस फ्रैकीबैक्टर' (Candidatus Frackibacter) नामक विशेष बैक्टीरिया की आधिकारिक पुष्टि हुई।
पहले यह माना जाता था कि यह जीव केवल इंसानों द्वारा की जाने वाली 'फ्रैकिंग' (Fracking) साइट्स पर ही पाया जाता है।
लेकिन किड क्रीक के गहरे भूजल में इसकी मौजूदगी ने साबित कर दिया कि यह जीव पृथ्वी के इस 'डीप बायोस्फीयर इवोल्यूशन' (Deep Biosphere Evolution) का असली 'मूल निवासी' (Indigenous) है।
यह बैक्टीरिया संभवतः पृथ्वी का सबसे एकाकी प्राणी है, जिसे जिंदा रहने के लिए सूरज की रोशनी या वायुमंडलीय ऑक्सीजन की कोई आवश्यकता नहीं है।
आपास की चट्टानों में मौजूद यूरेनियम के रेडियोधर्मी क्षय (Radioactive Decay) से पानी के अणु टूटते हैं और लगातार हाइड्रोजन गैस बनती है।
विज्ञान की भाषा में इसे 'रेडियोलिसिस एनर्जी इकॉनमी' (Radiolysis Energy Economy) कहा जाता है, और यही वह अदृश्य ईंधन है जिसके दम पर यह बैक्टीरिया अपना पूरा साम्राज्य चला रहा है।
क्या नासा के रोवर मंगल पर गलत जगह खुदाई कर रहे हैं?
अगर किड क्रीक खदान में जीवन के लिए सूर्य की रोशनी और सतह का होना अनिवार्य नहीं है, तो अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए यह एक बहुत बड़ा और असहज करने वाला सवाल खड़ा करता है।
क्या यह संभव है कि नासा (NASA) और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के रोवर मंगल की सूखी और बंजर सतह पर जीवन के सुराग ढूंढकर अपना समय और अरबों डॉलर बर्बाद कर रहे हैं?
किड क्रीक का यह रेडियोलिसिस-आधारित इकोसिस्टम नासा के 'परसेवरेंस रोवर' (Perseverance rover) और आगामी ग्रहीय मिशनों के लिए एक वास्तविक 'सर्वाइवल गाइड' बन चुका है।
ब्रह्मांडीय पहेली और भविष्य का अनसुलझा मील का पत्थर
यह 'अदृश्य जीवमंडल' साबित करता है कि जीवन ब्रह्मांड के सबसे कठोर, जहरीले और अंधेरे कोनों में भी पनपने की अभूतपूर्व जिद रखता है।
अब पूरी वैज्ञानिक बिरादरी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मंगल ग्रह के गहरे क्रस्ट या शनि के चंद्रमा 'एन्सेलाडस' (Enceladus) की गहराइयों में भी 'फ्रैकीबैक्टर' जैसे जीव हमारा इंतजार कर रहे हैं?
इस ब्रह्मांडीय पहेली का अंतिम जवाब शायद सतह की सतही जांच में नहीं, बल्कि आने वाले दशक के अति-आधुनिक गहरे अंतरिक्ष ड्रिलिंग मिशनों (Deep-drilling missions) के नतीजों में छिपा है।

