74,000 साल पहले जब धरती से इंसान खत्म होने वाले थे!

सोचिए, अगर कल सुबह सूरज ही न निकले और पूरी दुनिया में अचानक बर्फ के साथ ज़हरीली राख बरसने लगे? ठीक ऐसा ही खौफनाक मंजर 74,000 साल पहले इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप पर हुआ था।


इसे 'यंगेस्ट टोबा इरप्शन' (Youngest Toba eruption) कहते हैं। यह पिछले 25.8 लाख सालों (Quaternary period) में धरती पर हुआ सबसे विनाशकारी ज्वालामुखी विस्फोट था, जिसने सच में हमारी पूरी मानव जाति को खत्म होने की कगार पर ला खड़ा किया था।

9 दिन का वो खौफनाक 'धमाका'

यह तबाही महज कुछ घंटों की नहीं थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह खौफनाक विस्फोट नौ से 14 दिनों तक लगातार जारी रहा था। इस दौरान राख का एक विशाल गुबार 32 किलोमीटर की ऊंचाई तक आसमान में उठा और उसने पूरी धरती के सूरज को ढक लिया।

स्टेनली एम्ब्रोस की मशहूर 'जेनेटिक बॉटलनेक थ्योरी' के अनुसार, इस एक धमाके ने दुनिया में इंसानों की आबादी को सिकोड़कर मात्र 3,000 से 10,000 व्यक्तियों तक सीमित कर दिया था। आज हम जो आठ अरब लोग हैं, वो उन्हीं चंद बचे हुए इंसानों की ही संतानें हैं।

1,500 साल लंबी 'ज्वालामुखीय सर्दी' का सच

आखिर सूरज की रोशनी कैसे गायब हो गई? टोबा ने आसमान में अरबों टन सल्फर डाईऑक्साइड (SO₂) गैस उगली थी। यह गैस वायुमंडल में जाकर 'सल्फेट एयरोसोल्स' में बदल गई और उसने सूरज की रोशनी को धरती तक पहुंचने से पूरी तरह रोक दिया।

इसके बाद जो 'ज्वालामुखीय सर्दी' आई, वैज्ञानिक उसे 'ग्रीनलैंड स्टेडियल 20 (GS-20)' कहते हैं। यह भयावह ठंड और बर्फ का नरक लगभग 1,500 साल तक धरती को जमाता रहा।

विस्फोट इतना भयानक था कि जिस जगह से मैग्मा निकला, वहां एक विशाल काल्डेरा (गड्ढा) बन गया। आज उसी में पानी भर चुका है जिसे हम 'लेक टोबा' (Lake Toba) के नाम से जानते हैं।

टोबा विस्फोट के रोंगटे खड़े करने वाले आंकड़े

  • धमाके की ताकत: इस महाविस्फोट को VEI-8 का दर्जा मिला है, जो ज्वालामुखी का सबसे खतरनाक और उच्चतम स्तर है।
  • उबला हुआ लावा: मिशिगन टेक यूनिवर्सिटी के बिल रोज़ और क्रेग चेसनर की रिसर्च के अनुसार, टोबा ने न्यूनतम 2,800 से लेकर अधिकतम 3,800 क्यूबिक किलोमीटर (DRE) तक मैग्मा बाहर फेंका था।
  • दुनिया भर में राख: इस धमाके ने पृथ्वी की सतह के 7.5 प्रतिशत हिस्से (लगभग 3.8 करोड़ वर्ग किलोमीटर) को राख से ढक दिया था।
  • भारत पर सीधा असर: भारतीय उपमहाद्वीप पर पांच सेंटीमीटर मोटी राख की चादर बिछ गई थी—मतलब आज जहां आप बैठे हैं, वहां भी टोबा की ज़हरीली राख गिरी थी।

इंसानों ने कैसे बचाई अपनी जान?

इतनी भयानक सर्दी और तबाही के बाद भी इंसान कैसे बचे? 'नेचर' (Nature) और 'साइंस डायरेक्ट' की रिसर्च बताती है कि हमारे पूर्वज हार मानने वालों में से नहीं थे।

दक्षिण अफ्रीका के पिनेकल पॉइंट जैसे तटीय इलाकों में मिले सबूत बताते हैं कि जब ज़मीन पर शिकार खत्म हो गया, तो इंसानों ने समुद्र के किनारे रहकर सी-फूड (मछलियां और सीपियां) खाकर खुद को ज़िंदा रखा। यह उनके एडैप्टेशन (Adaptation) का सबसे बड़ा उदाहरण है।

भारत का 'ज्वालापुरम' जो पश्चिमी मीडिया छिपाता है

विदेशी रिपोर्ट्स अक्सर इस बात को नज़रअंदाज़ कर देती हैं कि भारत में मौजूद इंसानों ने इस भयानक राख के बीच भी अपना जीवन कैसे जारी रखा।

आंध्र प्रदेश के कुर्नूल जिले में मौजूद 'ज्वालापुरम' (Jwalapuram) की खुदाई में टोबा की राख के ठीक नीचे और ऊपर एक जैसे पत्थर के औजार मिले हैं। इसका सीधा मतलब है कि भारत के हमारे पूर्वज इस तबाही के बावजूद न सिर्फ ज़िंदा रहे, बल्कि उन्होंने अपनी तकनीक और हुनर भी नहीं छोड़ा।

क्या ऐसा दोबारा होगा?

अब सबसे बड़ा और डरावना सवाल यह है कि क्या भविष्य में कोई दूसरा टोबा हमारी दुनिया को खत्म कर सकता है? वैज्ञानिकों का मानना है कि अमेरिका का 'येलोस्टोन' (Yellowstone) ऐसा ही एक खामोश सुपर-ज्वालामुखी है।

अगर आज के डिजिटल युग में ऐसा VEI-8 स्तर का कोई विस्फोट होता है, तो हमारा पूरा इंटरनेट, ग्लोबल सप्लाई चेन और खेती कुछ ही दिनों में पूरी तरह तबाह हो जाएंगे। इसलिए, टोबा की कहानी सिर्फ एक इतिहास नहीं है, बल्कि यह याद दिलाती है कि जब नेचर पलटवार करती है, तो संभलने का मौका नहीं देती।

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